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गुरुकुल में गीता जयंती महोत्सव, पूर्व राज्यपाल कलराज मिश्र ने कहा कि हर व्यक्ति के लिए गीता में दिशा निर्देश

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ग्रेटर नोएडा। सेक्टर ईटा-एक स्थित महर्षि पाणिनि वेद-वेदांग विद्यापीठ गुरुकुल में गीता जयंती के अवसर पर गीता महोत्सव और संगोष्ठी का आयोजन किया गया। आयोजन में गुरुकुल के बटुकों ने भगवान का पूजन तथा गीता एवं विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ किया। उसके उपरांत महर्षि पाणिनि धर्मार्थ ट्रस्ट (रजि.) द्वारा गीता की उपादेयता एवं आधुनिक जीवन में उसका प्रभाव विषय पर संगोष्ठी आयोजित की गई। गीता के दिव्य उपदेशों से आलोकित मानव सभ्यता, धर्म, नीति, कर्म और ज्ञान के अमृत-स्रोत को समर्पित गीता जयंती महोत्सव का आयोजन आज महर्षि पाणिनि वेदांग विद्यापीठ के पवित्र प्रांगण में आध्यात्मिक गरिमा एवं भव्यता के साथ सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में देश-प्रदेश के प्रतिष्ठित साधु-संत, विद्वान, आध्यात्मिक नायक, सामाजिक कार्यकर्ता, उद्योग जगत के प्रमुख प्रतिनिधि एवं आधुनिक चिंतन के प्रेरक व्यक्तित्व सम्मिलित हुए।

अतिथि के रुप में पधारे पूर्व राज्यपाल कलराज मिश्र ने कहा कि श्रीमद्भगवत गीता को साक्षात श्री कृष्ण का स्वरूप माना जाता है और इनमें दिए गए ज्ञान से व्यक्ति अपने जीवन में अधर्म रूपी अंधकार को दूर कर सकता है। गुरुकुल की जीवन शैली का उद्धरण देते हुए जीवन के तत्वों को गीता से सीखने के बारे में कहा कि गीता ही केवल विश्व में ऐसा ज्ञान का भंडार है जिससे जिसके एक श्लोक को भी अपनाने से जीवन का सार और उद्देश्य समझ में आ जाता है। कलराज मिश्र ने कहा कि अपने जीवन के दिनचर्या का पालन करें, हर व्यक्ति के लिए गीता के अंदर दिशा निर्देश है, क्यों न उसका आचरण करें। गीता जयंती से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि अपने दिनचर्या को नियमित करते हुए ईश्वर तत्व को प्राप्त करने के लिए आध्यात्मिक चेतना को जागृत करें। ईश्वर दिशा में आचरण करने का प्रयास करें। इस दौरान उन्होंने गीता के बारे में कहा कि हर काल में गीता की उपादेयता है। गीता के बारे में जितना भी कहें कम है। गीता के माध्यम से व्यक्ति के ईश्वर के तत्व का जागृत करने का प्रयास किया है। उस ईश्वरत्व की दिशा में लगातार प्रयास करते रहते हैं। कर्म करते हुए हम ईश्वर को प्राप्त कर सकते हैं। अंतः चेतना की जागृति से ईश्वर के प्राप्त कर सकते हैं इसके बारे में गीता में लिखा गया है।

संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित स्वामी दयानन्द  महाराज ने गीता सार बताते हुए कहा कि कर्म के लिए विश्व भर में सबसे अधिक किसी धार्मिक ग्रंथ में उपदेश दिया गया है तो वह गीता ही है। उन्होंने गीता के प्रत्येक अध्याय के महत्व के बारे में विस्तार पूर्वक करते हुए अंतिम कर्मयोग अध्याय के बारे में बताया। गुरुकुल के अधिष्ठात्रा परमपूज्य आनंद ब्रह्मचारी महाराज ने अपने विचार रखते हुए कहा कि गीता जयंती को सनातन धर्म में एक प्रमुख त्योहार के रूप में मनाया जाता है, क्योंकि हिंदू पौराणिक मान्यता के अनुसार गीता एक बहुत ही पवित्र ग्रंथ है जिसे स्वयं भगवान कृष्ण ने अर्जुन को सुनाया था। गीता जयंती हर वर्ष मार्गशीर्ष के मास के शुक्लपक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। इस दिन को मोक्षदा एकादशी भी कहा जाता है। सामाजिक एवं व्यक्तिगत जीवन में गीता के महत्व के बारे में कहा कि आज तकनीकी दिशा में बढ़ते कदम हमारी परंपराओं से विमुख हो रहे हैं, ऐसे में गीता ही है जो हमें हमारे सार्थक उचित ज्ञान कराने में हमारा योगदान देती है।

ट्रस्ट के अध्यक्ष एवं गुरुकुल के संस्थापक आचार्य रविकांत  दीक्षित ने कहा कि यह पृथ्वी हमेशा ही योगियों के द्वारा संरक्षित रही है। उनमें से हमारे कृष्ण के रूप में परम योगी ने उपदेशात्मक वाक्य जो अर्जुन को कहे वही गीता है। गीता जयंती के दिन भगवान श्री कृष्ण द्वारा दिए गए उपदेशों को पढ़ा जाता है और जीवन में उन्हें पालन करने का प्रण लिया जाता है। गुरुकुल एक ऐसी संस्था है जिसके द्वारा हम अपने धार्मिक ग्रंथों को संरक्षित एवं पल्लवित कर सकते हैं। आधुनिक प्रचलित शिक्षा व्यवस्था में गीता को भी एक विषय के रूप में मान्यता मिले इसके लिए हम सब को प्रयासरत होना चाहिए। सभी से आग्रह करते हुए कहा हम सब प्रतिदिन यदि गीता पाठ ना कर सके तो गीता के कुछ लोगों को अवश्य पढ़ें।

गीता को जनसाधारण मनुष्य की पहुंच तक  बनाने के लिए गुरुकुल एक उचित माध्यम में इस पर कहा कि हमें अपने जीवन में गीता के किसी एक पंक्ति को भी अपनाना भी जीवन सुगम बनानेका साधारण मार्ग है।

संगोष्ठी में  वी.पी. नवानी, श्याम शंकर शुक्ला,  वेदप्रकाश शर्मा आदि वक्ताओं ने अपने-अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन अलंकार शर्मा ने किया। इस अवसर पर गुरुकुल परिवार के सदस्य एवं शहर के अन्य गणमान्य भी उपस्थित रहे। संपूर्ण प्रांगण गीता-ज्ञान, भारतीय संस्कृति, गुरुकुल परंपरा और सनातन चेतना की पावन सुगंध से सुवासित हो उठा।

 

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