ऋतुराज बसंत में प्रकृति की सुंदरता का अलौकिक वर्णन

Supernatural description of the beauty of nature in Rituraj Basant

१• नव संवत्सर : वसंत-विहंसित प्रकृति का दिव्य अभिनन्दन

२• प्रकृति का नववधू-सा अलौकिक श्रृंगार

३• वसंत-सुगंध में सजा नव संवत्सर का पावन पर्व

लेखकः भगवत प्रसाद शर्मा
मीडिया एक्जीक्यूटिव (भाजपा)
ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)
@ सर्वाधिकार सुरक्षित

जब कालचक्र का एक और परिक्रमण पूर्ण होकर नव संवत्सर का मंगलप्रभात लेकर आता है, तब सम्पूर्ण प्रकृति मानो नववधू की भाँति अपने अनुपम श्रृंगार में आलोकित हो उठती है। वसंत की मधुमयी वेला में धरा का हरित आंचल नवपल्लवों से आच्छादित हो जाता है, मानो सृष्टि स्वयं नवजीवन का स्वर्णिम परिधान धारण कर रही हो।
प्रभात की अरुणिमा जब नभमण्डल में स्वर्णाभा बिखेरती है, तब ओस-कण पल्लवों पर मोतियों की माला-से झिलमिलाने लगते हैं। मंद-मंद बहती समीर पुष्पों की सुरभि को अपने साथ लेकर वातावरण में एक अद्भुत माधुर्य घोल देती है। ऐसा प्रतीत होता है मानो सृष्टि का प्रत्येक कण नव संवत्सर के स्वागत में आनंद का वाद्य बजा रहा हो।
इसी अनुपम दृश्य को शब्दों में बाँधने का एक विनम्र प्रयास—
खिल गयी जुही, चम्पा, बेला और मोगरा, केतकी अपढारी,
पीली चुनरी ओढ़े प्रकृति भी लग रही आज कितनी प्यारी।
मंद पवन में सुरभि घुली है, उपवन-उपवन गान सुनाता,
नव जीवन का मधुर निमंत्रण, हर पल्लव मुस्काकर लाता।

पुष्प, पवन और पल्लवों का मधुर संगीत
वन-उपवनों में पलाश की अग्निमयी आभा, कचनार की कोमल मुस्कान और अमलतास की स्वर्णिम झरना-सी छटा प्रकृति के सौन्दर्य को अद्वितीय बना देती है। आम्र-वृक्षों की मंजरियाँ अपनी मधुर गंध से वातावरण को सुरभित कर देती हैं, और कोयल की कूक मानो नव संवत्सर का मंगलगान बन जाती है।
सरोवरों में खिले कमल सूर्य की प्रथम किरणों का अभिनन्दन करते प्रतीत होते हैं। नदियों की कल-कल ध्वनि, विहगों का मधुर कलरव और पवन की कोमल सरसराहट मिलकर ऐसा दिव्य संगीत रचते हैं, जिसमें सम्पूर्ण प्रकृति तन्मय हो उठती है।
ओस-बिन्दुओं की रजत-माल ये, पल्लव-पल्लव पर मुस्काए,
अरुण-किरण का स्वर्ण-स्पर्श ये, नव आशाएँ आज जगाए।
आम्र-मंजरियों की सुरभि से, महका कण-कण आज ये सारा,
नव संवत्सर के स्वागत में, देखो पुलकित हुआ जग सारा।
नव संवत्सर का संदेश : नवता और आशा का आलोक है।
प्रकृति का यह अनुपम सौन्दर्य केवल दृश्य-आनन्द ही नहीं, बल्कि एक गहन संदेश भी देता है। जैसे वृक्ष अपने पुराने पत्तों को त्यागकर नवपल्लवों को जन्म देते हैं, वैसे ही मनुष्य को भी अपने अंतर्मन की मलिनताओं को त्यागकर नवीन विचारों, श्रेष्ठ संकल्पों और उज्ज्वल कर्मों का आलोक अपने जीवन में प्रज्वलित करना चाहिए।
वसंत का यह आगमन हमें यह स्मरण कराता है कि जीवन में परिवर्तन ही सृजन का आधार है। हर अंत के गर्भ में एक नवीन आरम्भ छिपा होता है, और हर अंधकार के पश्चात् प्रकाश का उदय निश्चित है।
इस भावना को एक और काव्य-पंक्ति में अनुभव किया जा सकता है—
अरुणिम प्रभा से आलोकित जब नभ का अंचल होता है,
नव जीवन का संदेश लिये हर उपवन चंचल होता है।
हरित धरा पर स्वर्णिम छाया, सुरभित मधुवन की फुलवारी,
नव संवत्सर के स्वागत में सजती सृष्टि सुहागन न्यारी।

नव संवत्सर का यह मंगल अवसर हमें प्रकृति की इस दिव्य प्रेरणा को आत्मसात करने का निमंत्रण देता है। यदि हम भी अपने जीवन में सद्भाव, करुणा, परोपकार और नवसंकल्पों का प्रकाश जगाएँ, तो हमारा जीवन भी उसी प्रकार सुन्दर और सुगंधित बन सकता है जैसे वसंत में प्रकृति का उपवन।
आइए, इस पावन नव वर्ष पर हम अपने हृदय में आशा का दीप प्रज्वलित करें, विचारों में नवता का संचार करें और अपने कर्मों से इस संसार को थोड़ा और मधुर, सुन्दर और मंगलमय बनाने का संकल्प लें।
यही नव संवत्सर का सच्चा अभिनन्दन है —
नवता का आलोक, प्रकृति का सौन्दर्य और जीवन की अनन्त संभावनाएँ।

लेखकः भगवत प्रसाद शर्मा
मीडिया एक्जीक्यूटिव (भाजपा)
ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)
@ सर्वाधिकार सुरक्षित

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