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“गीता सबके लिए सब काल में” श्याम शंकर शुक्ला द्वारा रचित पुस्तक का हुआ विमोचन

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ग्रेटर नोएडा । भारतीय ज्ञान-परंपरा और अध्यात्म की दिशा में एक महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ा, जब संतुलित व्यक्तित्व और ग्रेटर नोएडा के रहने वाले लेखक श्याम शंकर शुक्ल द्वारा रचित उनकी पुस्तक “गीता सबके लिए सब काल में” का भव्य विमोचन  का आयोजित कांस्टीट्यूशन क्लब ऑफ़ इंडिया में किया गया। यह आयोजन अपनी गंभीरता, गरिमा और विद्वत्संपन्न वातावरण के कारण विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। समारोह के मुख्य अतिथि प्रख्यात विद्वान–नेता डॉ. कर्ण सिंह थे। मंच पर वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी भास्कर खुल्बे, आध्यात्मिक विभूति स्वामी प्रखरजी महाराज, लेखक और विद्वान सत्य सौरभ खोसला सहित अनेक प्रतिष्ठित विद्वान उपस्थित रहे, जिससे कार्यक्रम की गरिमा और बढ़ गई। सबने लेखक के सहज एवं सरल व्यक्तित्व और उत्कृष्ट कृति की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। मोतीलाल बनारसीदास द्वारा तीन खंडों में प्रकाशित यह  लगभग 2200 पृष्ठों का एक महत्त्वपूर्ण शास्त्रीय–आधुनिक ग्रंथ है, जिसमें गीता के कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग — तीनों आयामों का क्रमबद्ध, गहन और व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। प्रथम खंड कर्मयोग पर आधारित है, जिसमें अर्जुन को प्रदत्त कर्म के सिद्धांतों की व्याख्या की गई है। दूसरा खंड भक्तियोग को समर्पित है, जिसमें अध्याय 6 से 12 तक भक्ति–तत्व, भगवद्भाव और साधक–चैतन्य की विविध अवस्थाओं का विस्तारपूर्वक विवेचन है। तृतीय खंड ज्ञानयोग पर आधारित है, जिसमें अध्याय 13 से 18 के माध्यम से आत्मा, प्रकृति, गुणों की संरचना, श्रद्धा, ज्ञान और मोक्ष के दार्शनिक आधारों को स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया गया है।

ग्रंथ की प्रेरणा लेखक के बचपन और पारिवारिक वातावरण में निहित रही, जब बस्ती ज़िले के एक छोटे ग्रामीण परिवेश में उनके पिता प्रतिदिन उनसे गीता सुनने का आग्रह करते थे। इस प्रक्रिया ने धीरे-धीरे लेखक के अंतर्मन में गीता के बीज बो दिए और समय के साथ यह बीज एक दीर्घकालिक संकल्प में विकसित हुआ। प्रशासनिक जीवन के दौरान वरिष्ठ अधिकारियों के साथ शास्त्रों पर हुई चर्चाओं ने इस दिशा को और मजबूत किया। आगे चलकर पारिवारिक जीवन में भी गीता निरंतर उनका मार्गदर्शन करती रही और अंततः यह त्रयी उसी आंतरिक साधना और दीर्घकालीन अध्ययन का पूर्ण रूप बनी।

इस ग्रंथ में श्रीमद्भगवद्गीता की श्लोक-दर-श्लोक व्याख्या के अतिरिक्त रामचरितमानस और गीता के कर्मयोग के मध्य तुलनात्मक अध्ययन तथा श्रीमद्भागवत और गीता के दार्शनिक संबंधों की भी विस्तृत चर्चा की गई है। साथ ही वेदों, उपनिषदों, अष्टावक्र गीता और अन्य शास्त्रों की दृष्टि से गीता की स्थिति और उसकी विशिष्टता का सुविस्तृत विश्लेषण किया गया है। आधुनिक शिक्षा-दृष्टि और गीता के शैक्षिक आयामों का भी तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है, जिससे यह ग्रंथ युवाओं, शोधार्थियों, तर्कशील पाठकों और आध्यात्मिक साधकों के लिए समान रूप से उपयोगी हो गया है। इस विमोचन समारोह में लगभग दो सौ  विद्वानों, वरिष्ठ अधिकारियों, आध्यात्मिक मार्गदर्शकों, समाजसेवियों और पाठकों की उपस्थिति रही। कार्यक्रम का संचालन गंभीरता और सौम्यता के साथ हुआ और पूरे आयोजन में अध्यात्म, ज्ञान और आधुनिक चिंतन का एक संतुलित संगम दिखाई दिया। आशा है कि गीता के शाश्वत संदेश को आधुनिक संदर्भों के अनुरूप प्रस्तुत करने वाली यह त्रयी आज के समय में एक महत्वपूर्ण कृति के रूप में स्थापित होगी, जिसने भारतीय ज्ञान-परंपरा और समकालीन समाज के बीच एक सुदृढ़ सेतु का निर्माण होगा।

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