विदेश मंत्रालय के अधिकारी पहुंचे जीबीयू ,आसियान देशों के सिविल सेवकों को मिलेगा प्रशिक्षण

विदेश मंत्रालय के अधिकारी पहुंचे जीबीयू ,आसियान देशों के सिविल सेवकों को मिलेगा प्रशिक्षण

-जीबीयू में विदेश मंत्रालय के सहयोग से चलेगा इटेक कार्यक्रम
-आसियान देशों के सिविल सेवकों को मिलेगा प्रशिक्षण
ग्रेटर नोएडा। गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय अब से विदेश मंत्रालय के आईटीईसी प्रोग्राम में इटेक प्रोग्राम चलाने वाले संस्थान के रूप में शामिल हो गया है। जीबीयू का इटेक प्रोग्राम चलाने वाले संस्थान रूप में विदेश मंत्रालय के इटेक पोर्टल में आया। फ़िलहाल कोविड की वजह से जीबीयू द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम ऑनलाइन ही होगी, लेकिन भविष्य में सभी प्रोग्राम भौतिक उपस्थिति में ही चलाई जाएगी। इसी क्रम में विदेश मंत्रालय के दो अधिकारी मनोज बिहारी वर्मा एवं अतुल भारद्वाज ने जीबीयू का भ्रमण किया और यहां पर उपलब्ध सुविधाओं को देखा और उपलब्ध सुविधा से संतुष्ट दिखे। उन्होंने विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. भगवती प्रकाश शर्मा से मिले और अपनी संतुष्टि ज़ाहिर की। प्रो. शर्मा ने इस उपलब्धि के लिए बौध अध्ययन एवं सभ्यता संकाय के सदस्यों को बधाई दी और साथ ही विदेश मंत्रालय के अधिकारियों को जीबीयू के प्रपोज़ल को अप्रूव्ड करने के लिए भी धन्यवाद ज्ञापन किया। प्रो. मलकानिया ने विदेश मंत्रालय के अधिकारियों से प्रोग्राम से सम्बंधित तकनीकी जानकारी पर बात की और साथ ही जीबीयू से मंत्रालय की क्या क्या अपेक्षाएं हैं उस पर भी बृहद चर्चा हुई। डॉ. अरविंद कुमार सिंह इस पूरे कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की है, उन्होंने ने अपने सभी शिक्षकों के साथ मंत्रणा की और अधिकारियों से इन सभी का परिचय भी करवाया। डॉ. सिंह का कहना है कि विभाग के साथ-साथ विश्वविद्यालय लिए भी यह गर्व की बात है। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है की जीबीयू की पहचान पूरे विश्व में होगी और जीबीयू बौध अध्ययन के एक बड़े केंद्र के रूप में विश्व पटल पर दिखेगी। विदेश मंत्रालय के इस कार्यक्रम से जुड़ने का एक और फ़ायदा यह होगा की जीबीयू में विदेशी छात्रों की संख्या भी बड़ेगी।
दर असल विदेश मंत्रालय को आसियान देशों के सिविल सेवकों के लिए आईटीईसी में बौद्ध धर्म और बौद्ध अध्ययन से संबंधित पाठ्यक्रमों को शामिल करने के निर्देश मिले थे। कार्यक्रम का समग्र उद्देश्य दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों (आसियान) के साथ बौद्ध धर्म के पहलुओं के साथ भारत के बौद्ध संबंधों और विरासत को बढ़ावा देना है।

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