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पौष पूर्णिमा के साथ शुरू हुआ कल्पवास, जाने कल्पवास और इसके नियम

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प्रयागराज। ‘गंग सकल मुद मंगल मूला। सब सुख करनि हरनि सब सूला’ के आवाह्न के साथ कल्पवास शुरू हो गया है। माघ मास के पहले स्नान पर्व पौष पूर्णिमा से शुरू हुआ कल्पवास माघी पूर्णिमा को समाप्त होगा। संगम की रेती पर कल्पवासी संयमित जीवन के साथ जप, तप में लीन हो गए हैं। साधु-संतों, कल्पवासियों के लिए संगम तट पर मीहने भर के जप, तप, ध्यान के लिए करीब 25 सौ बीघा क्षेत्रफल में तंबुओं की आध्यात्मिक नगरी बसाई गई है। इसका भव्य स्वरूप भी दिखाई पड़ रहा है। लाखों श्रद्धालुओं ने पौष पूर्णिमा पर संगम और गंगा के विभिन्न घाटों पर पुण्य की डुबकी लगाएंगे। स्नान का सिलसिला भोर पहर से शुरू होकर दोपहर बाद तक चलेगा। इसी के साथ एक माह का जप, तप, स्नान, ध्यान और दान का कल्पवास शुरू हो जाएगा। पुलिस और प्रशासन की ओर से स्नान के लिए प्रबंध किए गए हैं। कायाकल्प के निमित्त शिविरों में कल्पवासियों ने भोर में गंगा स्नान, ध्यान करके विधिविधान से कल्पवास का संकल्प लिया। कल्पवास के 21 नियमों को निष्ठा के साथ पालन से ही व्रत, संकल्प पूरा करेंगे। त्रिवेणी के पावन तट पर यह तपस्या जीवन-मरण के बंधन से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करेगी। कल्पवासियों की पहले दिन से ही दिनचर्या बदल गई। संकल्प पूरा करने के लिए भोर में जागना, दिन में दो बार स्नान, जमीन पर सोना, ब्रह्मचर्य जीवन का पालन करना, झूठ न बोलना, गृहस्थ की चिंता से मुक्त रहना, नियमित भजन, सत्संग व रामायण का पाठ करना, दूसरों की निंदा से दूर रहना शुरू किया गया है। खुद या पत्नी का बनाया भोजन करना शुरू किया गया है। संगम की रेती पर कल्पवास के लिए प्रदेश के फैजाबाद, जौनपुर, भदोही, वाराणसी, मिर्जापुर, फतेहपुर, कौशाम्बी, प्रतापगढ़ के अलावा गंगापार-यमुनापार से बड़ी संख्या में श्रद्धालु आए हैं। साथ ही मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार और राजस्थान के श्रद्धालु भी कल्पवास के लिए आए हैं।

विधिविधान से लिया कल्पवास का लिया संकल्प

कल्पवास शुरू करने के पूर्व श्रद्धालुओं ने भोर में गंगा स्नान करके  पुरोहितों के आचार्यत्व में पूजन-अर्चन कर संकल्प लिया। शिविर में विष्णु सह्रसनाम, राम रक्षा स्त्रोत पाठ, नारायण कवच, शालिग्राम की पूजा, शिव की पूजा और विधिविधान से रुद्राभिषेक पूजन किया। कल्पवास शब्द में ‘कल्प’ का अर्थ है युग और ‘वास कर अर्थ है रहना। अर्थात किसी पवित्र भूमि में कठिनाई के साथ अनुरक्ति और विरक्ति दोनों भावनाओं से प्रेरित होकर निश्चित समय तक रहने को कल्पवास कहते हैं।

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