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मानव मस्तिष्क की भाषा को समझने की दिशा में हुआ ऐतिहासिक पहल

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-पांच दिवसीय अंतरराष्ट्रीय न्यूरो एवं बायोफीडबैक प्रशिक्षण और सम्मेलन का सफल समापन

-गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय तथा  बैक्सन होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के संयुक्त तत्वावधान में हुआ आयोजित

ग्रेटर नोएडा। गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय तथा  बैक्सन होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के संयुक्त तत्वावधान में पांच दिवसीय “न्यूरो एवं बायोफीडबैक प्रशिक्षण,  एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन” का भव्य समापन हुआ। यह आयोजन कुलपति प्रो. राणा प्रताप सिंह, कुलसचिव डॉ. विकास त्रिपाठी, अधिष्ठाता प्रो. वंदना पांडे, तथा बैक्सन कॉलेज के प्राचार्य प्रो. सी. पी. शर्मा के मार्गदर्शन, प्रेरणा और सतत सहयोग से सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम के प्रारम्भिक तीन दिवस न्यूरोफीडबैक और बायोफीडबैक प्रशिक्षण के लिए समर्पित रहे, जहाँ देश-विदेश के प्रतिभागियों को इन आधुनिक उपचारात्मक तकनीकों की सैद्धांतिक और व्यावहारिक समझ प्रदान की गई। प्रतिभागियों ने ई.ई.जी उपकरणों के माध्यम से मस्तिष्क तरंगों के प्रत्यक्ष परीक्षण और आत्म-नियंत्रण के प्रयोग किए। इन सत्रों में तनाव प्रबंधन, एकाग्रता वृद्धि, अनिद्रा, माइग्रेन और व्यवहार संशोधन जैसे विषयों पर गहन व्याख्यान एवं प्रायोगिक प्रदर्शन हुए। अंतिम दो दिवस न्यूरोफीडबैक और बायोफीडबैक सोसाइटी के तत्वावधान में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के रूप में सम्पन्न हुए। इस सम्मेलन ने वैश्विक स्तर पर विचार-विनिमय और अनुसंधान की एक नई दिशा प्रस्तुत की। कार्यक्रम में जर्मनी से प्रसिद्ध न्यूरोथैरेपिस्ट डॉ. रूडिगर शेलनबर्ग और अमेरिका की प्रतिष्ठित मनोवैज्ञानिक डॉ. उर्सुला किल्च की उपस्थिति ने इसे विशिष्ट गरिमा प्रदान की। डॉ. रूडिगर ने कहा कि “मस्तिष्क तरंगों की भाषा को समझना ही उपचार की वास्तविक दिशा है”, वहीं डॉ. उर्सुला ने माइंडफुलनेस बेस्ड मेडिटेशन और कम्पैशन पर अपने गहन विचार साझा करते हुए बताया कि आत्म-जागरूकता और करुणा मानसिक स्वास्थ्य की सबसे गहरी जड़ें हैं।

इस सम्मेलन में देश-विदेश से आए 300 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया, 50 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत किए गए और 20 से अधिक वैज्ञानिक सत्र आयोजित किए गए। प्रस्तुत शोध पत्रों में से चार उत्कृष्ट शोध पत्रों को सर्वश्रेष्ठ घोषित किया गया, जिन्हें विशेष रूप से सम्मानित किया गया। सम्मेलन ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि न्यूरोफीडबैक और बायोफीडबैक जैसी तकनीकें न केवल मानसिक विकारों के उपचार में सहायक हैं, बल्कि वे मनोविज्ञान, चिकित्सा और मानव चेतना के बीच एक सशक्त सेतु का निर्माण कर रही हैं।

कार्यक्रम के समापन सत्र में विभागाध्यक्ष डॉ. आनंद प्रताप सिंह ने सभी विशेषज्ञों, अतिथियों, प्रतिभागियों और आयोजन समिति के सदस्यों के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में वैश्विक सहयोग और अनुसंधान की दिशा में एक प्रेरक उदाहरण बन गया है। उन्होंने विशेष रूप से कुलपति प्रो. राणा प्रताप सिंह, कुलसचिव डॉ. विकास त्रिपाठी, अधिष्ठाता प्रो. वंदना पांडे, तथा प्राचार्य प्रो. सी. पी. शर्मा के सहयोग और प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया।

यह पाँच दिवसीय आयोजन केवल एक अकादमिक गतिविधि नहीं रहा, बल्कि यह उस विचार का प्रतीक बन गया जिसने यह सिद्ध किया कि मानव मस्तिष्क को समझना ही मानवता को समझने की दिशा है। इस सम्मेलन ने आने वाले समय में मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में एक नई चेतना का संचार किया।

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