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आध्यात्म: तनाव से मुक्ति के लिए वरदान

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भगवत प्रशाद शर्मा, 
गलगोटियास विश्वविद्यालय
ग्रेटर नौएडा उत्तर प्रदेश।

हम सभी के जीवन में अनेक प्रकार की समस्यऐं सदैव आती जाती रहती हैं और उनके समाधान भी होते रहते हैं। यह एक सामान्य सी बात है। परंतु आज की समस्त मानव जाति के सामने कोरोना जैसी वैश्विक महामारी का जो संकट आकर खड़ा हुआ है वह अपने आप में बहुत ही कष्टदायक और भयभीत करने वाला है। चारों ओर त्राहि त्राहि मची हुई है। ऐसा क्रन्दन और मौत का ऐसा विकराल रूप हमने पहले अपने जीवन में कभी नहीं देखा था।
आज पूरी दुनिया में इस महामारी ने लाखों लोगों की जीवन लीला को समाप्त कर दिया है। चारों और मौत का ताँडव दिन प्रति दिन बढ़ता ही जा रहा है। न जाने मौत का ये क्रम कब और कहाँ जाकर रुकेगा अभी इस बारे में कुछ भी कहा नहीं जा सकता है। इस महामारी का संक्रमण इतनी तेज़ गति से फैल रहा है कि उसके सामने पूरी दुनिया की सारी व्यवस्थाऐं चौपट हो चुकी है। पूरी दुनिया इसके सामने बेबस और लाचार सी दिखाई पड़ रही है।
अब तो जब तक कोई वैक्सीन इसके निदान लिए नहीं बनती है तब तक आम जनमानस के मन में मौत का डर पल-पल और दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही चला जा रहा है, चारों ओर पूरी दुनिया में सभी के मन में मौत के डर से एक प्रकार मानसिक तनाव बढ़ता ही जा रहा है। “दिन-प्रति दिन मौत बहुत ही निर्दयीता के साथ अपना खेल खेल रही है। हर पल उसका ताँडव बढता ही जा रहा है। “
संकट की इस घडी में आज इस बात की महत्ती आवश्यकता है कि हम सबको मिलकर इस वैश्विक महामारी का डटकर मुक़ाबला करना होगा। इससे हमें डरना नहीं हैं। हमारे पूर्वजों ने भी कहा है कि जीवन में कभी भी संकट के समय में हिम्मत नहीं हारनी चाहिए और ना ही अपने ईश्वर को भूलना चाहिए। हमारे लोकाचार में एक पुरानी कहावत भी है कि “हारिये ना हिम्मत और बिसारिये ना राम” यानि जीवन में चाहे कितनी भी विकट परिस्थितियाँ आ जायें हमने कभी भी हिम्मत नहीं हारनी है और ना ही कभी भी अपने ईश्वर को भूलना है। हमें सदैव नेकी के रास्ते पर चलते हुए आगे बढ़ना है और इस बात का ख़्याल रखना है कि ये पूरी दुनिया उस ईश्वर की बनायी हुई है जो हम सबका सृजनहार भी है और पालनहार भी है। उसकी मर्ज़ी के बिना यहाँ पर एक पत्ता भी नहीं हिल सकता है। सब कुछ करने वाला तो वही है, हमें तो केवल नेकी के रास्ते पर चलना है। इसीलिये परोपकार की भावना को अपने ह्रदय में रखकर शुभ कर्म करते हुए आगे बढ़ना हैं।
फिर भी यहाँ पर हम एक बात आपसे बहुत ही ईमानदारी के साथ कहना चाहते हैं कि जीवन में शुभ कर्म करने के लिये आपका ह्रदय निर्मल होना चाहिये और आपकी चित्तवृतियाँ पवित्र होनी चाहियें। लेकिन यह तभी सम्भव है जब हमारा आध्यात्मिक बल बहुत ही उच्चकोटि का हो। आध्यात्मिक बल को मजबूत बनाकर तनाव से कैसे मुक्ति पा सकते हैं यही इस लेख का मुख्य बिन्दु भी है और इसका शीर्षक भी है। अब हम सबसे पहले ये जान लें कि आध्यात्म है क्या? और उसको किस प्रकार के उपायों से शक्तिशाली बनाया जा सकता है। सही मायनों में मन को आत्मा के साथ जोड़ना ही आध्यात्म है।
अब बात करते हैं कि मन को आत्मा के साथ कैसे जोड़ा जाये जिससे हमारी आध्यात्मिक उन्नति निरन्तर रूप से होती रहे? हमें इस बात का भी विशेष ध्यान रखना होगा कि हम संसार के तीनों तापों को (दैहिक,दैविक और भौतिक) जीतकर अपने इस जीवन को तनाव मुक्त कैसे बनायें? हमें चाहिये कि हम निरन्तर एक सकारात्मक सोच के साथ नये से नये आयामों की स्थापना करते हुए ऐसे कार्य करें कि जिससे हमारा ये छोटा सा जीवन सही मायनों में सफलता की ओर अग्रसर होता रहे।
हमारे ऋषि-मुनियों ने कहा है कि मनुष्य की श्रेष्ठता इस बात पर निर्भर करती है कि व्यक्ति का आध्यात्मिक बल जितना उच्च श्रेणी का होगा वह व्यक्ति उतना श्रेष्ठ भी होगा। लेख के अंतिम पड़ाव में अब हम इस बात पर केन्द्रित रहेंगे कि अपने आध्यात्मिक बल को बढ़ाने के लिये हमें क्या-क्या उपाय करने चाहियें। आईये अब हम उन उपायों पर विस्तार से चर्चा करें।

1. दिनचर्या: हमारी दिनचर्या बहुत ही अनुशासित और संयमित होनी चाहिये। हमें रात्री में जल्दी सोना चाहिये और सुबह ब्रह्म मुहूर्त, जिसे अमृत बेला कहते हैं, में ही जागना चाहिये। क्योंकि उस समय की प्राण वायु हमारे शरीर को अद्भुत ऊर्जा और कांति प्रदान करती है। इस अमृतवेला में कम से कम एक घंटे का मॉर्निग-वॉक करना बहुत ही ज़रूरी है
2. योगा:प्रणायामऔर स्वाध्याय ये ऐसी अद्भुत क्रियायें हैं जिनके करने से हमारे शरीर में नयी ऊर्जा का संचार होता ही है। इसके साथ-साथ हमारे रक्त की शुद्धि भी होती है और श्वेत रक्त कणिकाएँ ज्यादा मात्रा में बनती हैं जिनसे हमारे शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता (एम्युनिटी सिस्टम) मज़बूत होती है।
3. खानपान:- निश्चित रूप से हमारा खानपान सात्विक, रुचिकर और पौष्टिक होना चाहिये, और इस बात का विशेष ध्यान रखें कि ये अपने निश्चित समय पर ही हो। भोजन को बनाते समय और खाते समय दोनों वक्त स्वच्छता और अपने साकारात्मक विचारों पर विशेष ध्यान देना चाहिये।
4. संगीत:– संगीत में वो जादू है जो तनाव से तो मुक्ति दिलाता ही है साथ ही साथ ये मानसिक रोगों से भी निजात दिलाने में बहुत ही सहायक है। संगीत के माध्यम से तो हमारे ऋषि मुनियों ने सिद्धियों को भी प्राप्त किया है। इस संदर्भ में संत श्री हरिदास जी का उदाहरण हमारे समक्ष यगों-युगों से है।
5. ईश्वरीय उपासना और ध्यान:- यह मार्ग तो सर्वश्रेष्ठ मार्ग कहा गया है। यह मार्ग केवल तनाव से ही मुक्ति नहीं दिलाता बल्कि संसार के तीनों तापों से बन्धन मुक्त कर देता है।। यह अद्भुत भी है और अलौकिक भी। जब हम घर में पूजा करने के लिये एकान्त स्थान में बैठकर पूर्ण समर्पण के साथ अपने इष्टदेव का ध्यान करते हैं और उनकी कथाओं का उनकी लीलाओं का मनन करते हैं तो कई बार ध्यान करते-करते उस परमात्मा के प्रेम में शरीर पुलकित हो जाता है। वाणी रूक जाती है और अनायास ही नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगती है। तब ये जान लीजिये कि यही वो सुखद क्षण हैं जब मन पूर्ण रूप से ईश्वर की शरण में पहुँचने का अथक प्रयास कर रहा होता है। यह स्तिथि भक्ति की पराकाष्ठा है। यह संतजनों ने भी कहा है और लेखक का निजि रूप से अपना अनुभव भी है। गोस्वामी जी ने तो श्री रामचरितमानस में एकदम से साफ़ लिखा है कि “राम नाम की औषधि जो खरी नीयत से खाय, अँग रोग ब्यापै नहीं महारोग मिट ज़ायै”
6. मंत्रों के जाप की यदि हम बात करें तो उनका अपना बहुत ही अलौकिक प्रभाव है। चाहे आप राम मंत्र का जाप करें, चाहे आप गायत्री मंत्र का जाप करें और चाहे आप प्रणव(ॐ)का जाप करें।मंत्र महामणि विषय व्याल के, मैटहि कठिन कुंअक भाल के। सभी मंत्रों की शक्तियाँ अपने आप में अपरिमित और अतुलनीय हैं, उनके जप करने से जो अद्भुत परिणाम मिले हैं वो अपने आप में अलौकिक हैं और महान पुण्यों को देने वाले हैं। अब तक ना जाने कितने ही ऋषिमुनियों ने इन मंत्र शक्तियों के बल पर अनेक प्रकार की ऋिद्धि-सिद्धियों को प्राप्त करके जन कल्याण के कार्य किये हैं।अबआप भी आगे आयें और इन उपरिलिखित उपायों का अपने जीवन में नियमित रूप से प्रयोग करके अपने आध्यात्मिक बल को बढ़ाकर तनाव मुक्त और मानवता से परिपूर्ण जीवन जीने की कला सीखें। मानवता अपने आप में एक मंत्र भी है और एक यज्ञ भी। आप अपने जीवन पथ पर निरन्तर उन्नति की ओर अग्रसर हों यही हमारी शुभकामनाएँ हैं।

सौजन्य- (भगवत प्रशाद शर्मा,
गलगोटियास विश्वविद्यालय
ग्रेटर नौएडा उत्तर प्रदेश।)

 

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