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बार-बार हमारे जवानों का इस तरह से शहीद होना, क्या हमारी कमजोरी नहीं है ?

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बार-बार हमारे जवानों का इस तरह से शहीद होना,
क्या हमारी कमजोरी नहीं है ?

क्या शासन और प्रशासन को अपनी अंदरुनी खुफिया योजनाओं के बार-बार बिफल हो जाने का बिल्कुल भी अफसोस नहीं है ? क्या हम अपने अतीत से बिल्कुल भी सीख नहीं ले रहे हैं ? जिनका मस्तिष्क इस विषय पर तो बहुत चलता है कि विश्व के सबसे बड़े इस प्रजातंत्र की सत्ता पर काबिज कैसे हुआ जाए, उनका मस्तिष्क इस तरफ नहीं जाता है कि किस तरीके से हमारे देश के नौजवान हमारी नाकाम बिफल योजनाओं की भेंट चढ़ रहे हैं। बार -बार इस तरह से शहीद होने वाले देश के महावीरों की विराट शहादत पर उन सभी को भावभीनी श्रद्धांजलि निवेदित करता हूँ और माँ भारती से प्रार्थना करता हूँ कि उनके बाद उनके परिवार को इस अपूर्णीय क्षति को सहन करने की सामर्थ्य प्रदान करें,लेकिन साथ ही साथ देश के नीति-नेतृत्व करने वालों की घोर निंदा एवं भर्त्सना भी करता हूँ। आत्मप्रशंसा पर मुग्ध होना हमारे पतन का प्रारम्भ है। कितनी हास्यास्पद विड़म्बना है कि हमारे देश के नौजवान हमारे देश के ही नक्सलियों द्वारा ही बड़ी निर्दयतापूर्वक मारे जा रहे हैं और हमारे नीति-निर्धारण करने वाले तथाकथित उपाधियों से विभूषित दूरदर्शी, विद्वान, विराट पुरुष, कूटनीति के धुरंधर, विश्व को लोहा मनवाने वाले, अतिविशिष्ट पदों को महिमामंडित करने वाले अपने देश के भीतर ही पलने एवं पोषित होने वाले उग्रवादियों का सफाया करने में पूर्णतया विफल क्यों हैं ? जब देश के सेनापति कुछ एक गिने-चुने अच्छे कामों का ढोल पीटते, उसका विज्ञापन करते नहीं थकते तो फिर इस प्रकार शहीदों के बलिदान की जिम्मेदारी किसे दी जानी चाहिए ?हम हमारे मन में कभी न होने वाले अतिशय संशय को पाल बैठते हैं कि हम सदैव इस पृथ्वी का भोग करेंगे, पर ये ना कभी हुआ है और कभी होना भी नहीं है। ये हमारा मानसिक प्रलाप ही है, जो हम ऐसा मानकर इस पर चलते हैं। भारतक्षेत्र भूमि का एक टुकड़ा नहीं है। यह हमारी सभी की माँ है। इसी माँ ने हम सभी को अपनी-अपनी भूमिकाओं को सौंप रखा है। यदि हममें से कोई भी अपनी भूमिका के साथ न्याय नहीं कर रहा है, तो वह निश्चित रूप से राष्ट्र द्रोही है, देशद्रोही है, माता का द्रोही है। हमारे धर्मग्रन्थ जिनका हम सभी अपने-अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए बड़ा डंका पीटते हैं, वे सभी आर्षग्रन्थ हमें यही शिक्षा देते हैं कि जो भूमिका तुम्हें सौंपी गयी है या जिस भूमिका का दायित्व तुम्हें दिया गया है, उसका निर्वहन अपने प्राणों की परवाह किये बिना भी करो। हमें सदैव ये ध्यान रखना चाहिए कि हम जिस जगह पर हैं, वास्तव में क्या यहाँ रहते हुए अपनी भूमिका का निर्वहन उचित तरीक़े से कर रहे हैं और यदि किंचितमात्र भी लगे कि जिस पद पर हैं,वहाँ न्याय नहीं कर पाए तो तत्काल उससे हट जाना चाहिए। समय निकल जाने पर न्याय भी अन्याय हो जाता है।
हमें ध्यान रखना चाहिए कि यदि दैवयोग से हमारा प्रतिद्वंदी कमजोर है तो हमें यह अतिरेक का भ्रम कतई नहीं पाल लेना चाहिए कि हमें अब पटखनी देने वाला कोई नहीं बचा है। इसलिए हमें अपने हिस्से में आने वाली जवाबदेही से कभी भी भागने का असफल प्रयास नहीं करना चाहिए। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की यही सुरक्षा व्यवस्था है ? यही हैं हमारे देश की गुप्त एजेंसियों की सूचनाएँ जिनका हम दम्भ भरते हैं ? जिस राष्ट्र का सुरक्षा तन्त्र असफल है, उस देश के सर्वोच्च सत्ताधारी को गहन चिन्तन एवं आत्ममंथन की आवश्यकता है, नहीं तो उस राष्ट्र को आतातायियों से कोई बचा नहीं सकता है। अनेकानेक बार होने वाले इस प्रकार के बलिदानों से हमारे देशवासी गहरे दुःख में हैं।
संजय देव ‛विमल’

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